जल संचय जन भागीदारी (JSJB) पहल
पाठ्यक्रम: जीएस-2/शासन
सन्दर्भ
- केंद्रीय जल शक्ति मंत्री ने बताया कि केंद्र की जल संचय जन भागीदारी (JSJB) पहल के अंतर्गत देशभर में 1.5 करोड़ से अधिक कृत्रिम भूजल पुनर्भरण एवं जल भंडारण संरचनाओं के निर्माण की सूचना प्राप्त हुई है।
जल संचय जन भागीदारी पहल का परिचय
- यह जल शक्ति मंत्रालय द्वारा वर्ष 2024 में जल शक्ति अभियान: कैच द रेन के अंतर्गत प्रारम्भ की गई एक राष्ट्रव्यापी सामुदायिक जल संरक्षण पहल है।
- उद्देश्य: जनसहभागिता, स्थानीय संस्थाओं, उद्योगों तथा सरकारी एजेंसियों की सक्रिय भागीदारी के माध्यम से जल संरक्षण को जन-आंदोलन में परिवर्तित करना।
- यह 3C मंत्र पर आधारित है—समुदाय,
कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर),लागत।
- यह एक समावेशी मॉडल अपनाती है, जो दीर्घकालिक जल सुरक्षा तथा जल संकट के प्रति लचीलापन बढ़ाने को प्रोत्साहित करता है।
- इस पहल के अंतर्गत राज्यों को पाँच क्षेत्रों में विभाजित किया गया है तथा जिलों को न्यूनतम 10,000 कृत्रिम पुनर्भरण एवं भंडारण संरचनाओं के निर्माण के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।
- सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले जिलों को श्रेणी-1 में 2 करोड़ रुपये का पुरस्कार दिया जाता है।
- श्रेणी-2 के जिलों को 1 करोड़ रुपये तथा श्रेणी-3 के जिलों को 25 लाख रुपये का पुरस्कार प्रदान किया जाता है।
स्रोत: IE
मिशन स्नेहजोरी
पाठ्यक्रम: जीएस-2/सरकारी पहल;
जीएस-3/ अर्थव्यवस्था
सन्दर्भ
- पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय के केंद्रीय मंत्री ने असम के मूगा रेशम क्षेत्र को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी विलासिता वस्त्र पारिस्थितिकी तंत्र में परिवर्तित करने हेतु मिशन स्नेहजोरी का शुभारंभ किया है।
परिचय
- इस मिशन का उद्देश्य पोषक पौधों की खेती को सुदृढ़ करना, रेशम रीलिंग अवसंरचना का आधुनिकीकरण करना, कृषक उत्पादक संगठनों को बढ़ावा देना तथा एकीकृत “स्नेहजोरी” ब्रांड के अंतर्गत वैश्विक बाजारों तक पहुँच का विस्तार करना है।
- इस पहल का क्रियान्वयन असम सरकार, केंद्रीय सिल्क बोर्ड, वस्त्र मंत्रालय तथा अन्य केंद्रीय एजेंसियों के सहयोग से किया जा रहा है।
केंद्रीय सिल्क बोर्ड का परिचय
- यह वस्त्र मंत्रालय के अधीन एक वैधानिक निकाय है, जिसकी स्थापना केंद्रीय सिल्क बोर्ड अधिनियम, 1948 (बाद में केंद्रीय सिल्क बोर्ड (संशोधन) अधिनियम, 2006) के अंतर्गत की गई थी।
- यह रेशमकीट पालन तथा रेशम उद्योग के विकास हेतु नीतियाँ बनाने और कार्यक्रमों के क्रियान्वयन के लिए उत्तरदायी है।
- मुख्यालय: बेंगलुरु, कर्नाटक
रेशमकीट पालन(Sericulture) की मूल बातें
- रेशमकीट पालन में रेशमकीटों (मुख्यतः Bombyx mori) का पालन किया जाता है, जो शहतूत, ओक, अरंडी और अर्जुन जैसे पौधों की पत्तियों पर पोषण प्राप्त कर कोकून बनाते हैं।
- इन कोकूनों को प्रसंस्कृत करके धागा और वस्त्र तैयार किए जाते हैं, जिससे कृषि और उद्योग का समन्वय होता है।
- भारत विश्व का एकमात्र देश है जो प्राकृतिक रेशम की सभी चार प्रमुख किस्मों का उत्पादन करता है—
- शहतूत रेशम (भारत के कुल उत्पादन का लगभग 70%)
- टसर रेशम (वन्य रेशमकीटों से प्राप्त)
- एरी रेशम (जिसे “अहिंसा रेशम” भी कहा जाता है)
- मूगा रेशम (भौगोलिक संकेतक प्राप्त उत्पाद)
- असम विश्व के लगभग 90 प्रतिशत मूगा रेशम का उत्पादन करता है।
- वर्तमान में भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा रेशम उत्पादक देश है तथा वैश्विक रेशम उत्पादन में उसका योगदान लगभग 25 प्रतिशत है। प्रथम स्थान पर चीन है।
स्रोत: DDNews
भूला दिए जाने का अधिकार
पाठ्यक्रम: जीएस-2/ शासन
सन्दर्भ
- दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा है कि भुला दिए जाने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्रदत्त निजता के मौलिक अधिकार का एक महत्वपूर्ण भाग है।
भारत में भुला दिए जाने के अधिकार की स्थिति
- भारत में अभी तक भुला दिए जाने के अधिकार पर कोई विशिष्ट कानून नहीं है।
- तथापि, व्यक्तिगत डेटा संरक्षण विधेयक, 2019 तथा विभिन्न न्यायिक निर्णयों में इस अधिकार को मान्यता दी गई है।
- के.एस.पुट्टास्वामी निर्णय (2017) में भारत के उच्चतम न्यायालय ने सूचना संबंधी निजता को निजता के अधिकार का अभिन्न हिस्सा माना था।
- इसके बाद दिल्ली उच्च न्यायालय तथा ओडिशा उच्च न्यायालय के निर्णयों ने इस अधिकार की व्याख्या को और विस्तृत किया तथा इसके विभिन्न आयामों पर चर्चा की।
स्रोत: TH
भारत के डेयरी विकास के लिए चुनौती बनती लू की घटनाएँ
पाठ्यक्रम: जीएस-3/ कृषि एवं पशुपालन
सन्दर्भ
- भारत में अत्यधिक गर्मी और लू की घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति ने देश के डेयरी क्षेत्र की दीर्घकालिक स्थिरता को लेकर चिंताएँ बढ़ा दी हैं।
भारत का डेयरी क्षेत्र
वैश्विक नेतृत्व
- भारत विश्व का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश है और वैश्विक दुग्ध उत्पादन में उसका योगदान 24.76 प्रतिशत है।
उत्पादन वृद्धि
- दुग्ध उत्पादन वर्ष 2014-15 के 146.31 मिलियन टन से बढ़कर वर्ष 2023-24 में 239.30 मिलियन टन हो गया।
आर्थिक योगदान
- डेयरी भारत की सबसे बड़ी कृषि वस्तु है, जो सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 5 प्रतिशत का योगदान देती है तथा 8 करोड़ से अधिक किसानों को रोजगार प्रदान करती है।
विकास प्रदर्शन
- पशुधन क्षेत्र ने वर्ष 2014-15 से 2020-21 के बीच 7.9 प्रतिशत चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर दर्ज की, जो कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर से अधिक है।
प्रति व्यक्ति उपलब्धता
- वर्ष 2023-24 में प्रति व्यक्ति दुग्ध उपलब्धता 471 ग्राम प्रतिदिन हो गई, जो वैश्विक औसत 322 ग्राम प्रतिदिन से काफी अधिक है।
प्रमुख दुग्ध उत्पादक राज्य
- उत्तर प्रदेश
- राजस्थान
- मध्यप्रदेश
लू की घटनाएँ डेयरी उत्पादन को कैसे प्रभावित करती हैं?
दुग्ध उत्पादन में कमी
- ऊष्मा तनाव के कारण पशुओं का चारा सेवन कम हो जाता है, जिससे दुग्ध उत्पादन के लिए आवश्यक पोषक तत्वों की उपलब्धता घट जाती है।
- पशु अपने शरीर के तापमान को नियंत्रित करने में अधिक ऊर्जा खर्च करते हैं, जिसके कारण दुग्ध संश्लेषण के लिए कम ऊर्जा उपलब्ध रहती है।
प्रजनन संबंधी तनाव
- बढ़ता तापमान प्रजनन क्षमता और गर्भाधान दर को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करता है।
- ऊष्मा तनाव के कारण गर्भपात तथा समयपूर्व प्रसव की घटनाएँ बढ़ जाती हैं।
दूध की गुणवत्ता में गिरावट
- अत्यधिक गर्मी दूध में वसा तथा वसा-रहित ठोस पदार्थों की मात्रा को कम कर देती है।
- चूँकि दूध खरीद मूल्य वसा और ठोस पदार्थों की मात्रा से जुड़ा होता है, इसलिए किसानों को प्रत्यक्ष आय हानि का सामना करना पड़ता है।
स्रोत: ET
उल्कापिंड विस्फोट
पाठ्यक्रम: जीएस-3/अंतरिक्ष
सन्दर्भ
- अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने पुष्टि की है कि एक अत्यंत चमकीला अग्निगोला उल्का आकाश में विस्फोटित हुआ, जिसने लगभग 300 टन टीएनटी के बराबर ऊर्जा मुक्त की तथा एक ध्वनि-विस्फोट उत्पन्न किया जिसे अमेरिका के विभिन्न भागों में सुना गया।
परिचय
- फायरबॉल अत्यंत चमकीले उल्का के लिए प्रयुक्त एक शब्द है, जिसकी चमक सामान्यतः –4 परिमाण से अधिक होती है। यह लगभग प्रातः या सायंकालीन आकाश में दिखाई देने वाले शुक्र ग्रह की चमक के समान होती है।
- बोलाइड फायरबॉल्स का एक विशेष प्रकार है, जो अपने अंतिम चरण में अत्यंत चमकीले विस्फोट के साथ समाप्त होता है तथा इसमें प्रायः टुकड़ों में विखंडन भी दिखाई देता है।
- प्रतिदिन पृथ्वी के वायुमंडल में फायरबॉल श्रेणी के कई हजार उल्का प्रवेश करते हैं।
- इनमें से अधिकांश महासागरों तथा निर्जन क्षेत्रों के ऊपर घटित होते हैं।
उल्का-कण, उल्का और उल्कापिंड
उल्का-कण(Meteoroid)
- यह अंतरिक्ष में गतिमान एक छोटा शैलखंड या कण होता है, जो सामान्यतः किसी धूमकेतु या क्षुद्रग्रह का भाग होता है।
उल्का(Meteor)
- जब कोई उल्का-कण पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश कर घर्षण के कारण जलने लगता है, तब आकाश में दिखाई देने वाली प्रकाश रेखा को उल्का कहा जाता है।
उल्का वर्षा(Meteor shower)
- जब समान स्रोत (जैसे किसी धूमकेतु के अवशेष) से उत्पन्न तथा लगभग समान कक्षाओं वाले अनेक उल्का-कण पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करते हैं, तो उसे उल्का वर्षा कहा जाता है।
उल्कापिंड(Meteorite)
- वह अंतरिक्षीय शैलखंड जो वायुमंडल से गुजरने के बाद भी पूरी तरह नष्ट नहीं होता और पृथ्वी की सतह तक पहुँच जाता है, उल्कापिंड कहलाता है।
स्रोत: TH
रुद्रम-II
पाठ्यक्रम: जीएस-3/रक्षा
सन्दर्भ
- भारत ने स्वदेशी रुद्रम-II वायु-से-भूमि प्रक्षेपास्त्र का सफल परीक्षण किया है, जिससे देश की स्वदेशी रक्षा क्षमता तथा सटीक प्रहार क्षमता को मजबूती मिली है।
परिचय
- रुद्रम-II एक वायु-से-भूमि पर मार करने वाला प्रक्षेपास्त्र है, जिसे हैदराबाद स्थित रिसर्च सेंटर इमारत(Research Centre Imarat) द्वारा विकसित किया गया है, जो रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन की प्रमुख प्रयोगशाला है।
- इसमें एक संकर नौवहन प्रणाली का उपयोग किया गया है, जिसमें—जड़त्वीय नौवहन प्रणाली,वैश्विक अवस्थिति प्रणाली तथा एक उन्नत निष्क्रिय लक्ष्य-निर्धारण तंत्र शामिल है, जो विस्तृत आवृत्ति क्षेत्र में रेडियो आवृत्ति उत्सर्जनों का पता लगा सकता है।
इसकी प्रमुख विशेषताएँ—
- अधिकतम गति: मैक 5.5
- मारक क्षमता: लगभग 300 किलोमीटर
- वारहेड भार: 200 किलोग्राम तक
- इसे 3 से 15 किलोमीटर की ऊँचाई पर उड़ रहे लड़ाकू विमानों, जैसे सुखोई एसयू-30 एमकेआई से प्रक्षेपित किया जा सकता है।
- यह प्रक्षेपास्त्र वर्तमान में सेवा में मौजूद रूसी मूल की केएच-31 विकिरण-रोधी प्रक्षेपास्त्रों के स्थान पर एक महत्वपूर्ण शक्ति-वर्धक के रूप में कार्य करेगा।
क्या आप जानते हैं?
- रुद्रम शृंखला के पूर्ववर्ती संस्करण रुद्रम-I की मारक क्षमता 100–250 किलोमीटर है तथा यह मैक 2 तक की गति प्राप्त कर सकता है।
स्रोत: TOI
ग्रीष्मकालीन वायु प्रदूषण और भू-स्तरीय ओजोन
पाठ्यक्रम: जीएस-3/पर्यावरण
सन्दर्भ
- वर्ष 2026 में भारत के अनेक शहरों में गंभीर ग्रीष्मकालीन वायु प्रदूषण देखा गया, जिसके कारण दिल्ली में ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (ग्रैप) के अंतर्गत प्रथम चरण के प्रतिबंध पुनः लागू करने पड़े।
ग्रीष्म ऋतु में भू-स्तरीय ओजोन का निर्माण
- भू-स्तरीय ओजोन एक द्वितीयक प्रदूषक है तथा यह सीधे वायुमंडल में उत्सर्जित नहीं होती।
- इसका निर्माण तब होता है जब—वाहनों से उत्सर्जित नाइट्रोजन ऑक्साइड,
तथा उद्योगों, रंगों, विलायकों और ईंधन उत्सर्जनों से निकलने वाले वाष्पशील कार्बनिक यौगिक, तीव्र सूर्यप्रकाश की उपस्थिति में परस्पर अभिक्रिया करते हैं।
- अत्यधिक गर्म ग्रीष्मकालीन परिस्थितियाँ और लू की घटनाएँ इस रासायनिक अभिक्रिया को तेज कर देती हैं, जिससे दिन के समय ओजोन का स्तर बढ़ जाता है।
- ओजोन और कणीय पदार्थ बच्चों, वृद्ध व्यक्तियों तथा फेफड़ों के रोगों से पीड़ित लोगों में गंभीर श्वसन रोग उत्पन्न कर सकते हैं।
ग्रीष्मकालीन वायु प्रदूषण के प्रमुख कारण
क्षेत्रीय धूल भरी आँधियाँ (लू)
- गर्म और शुष्क हवाएँ थार मरुस्थल तथा पश्चिम एशिया से धूल लाती हैं, जिससे पीएम-10 का स्तर तेजी से बढ़ जाता है।
स्थानीय धूल भरी आँधियाँ (आँधी)
- स्थानीय गर्जन-तूफानों के कारण उत्पन्न धूल भरी आँधियाँ ढीली मिट्टी को उठाकर शहरी क्षेत्रों में पहुँचा देती हैं।
शहरी ऊष्मा द्वीप प्रभाव
- कंक्रीट की सतहें तथा हरित आवरण में कमी स्थानीय तापमान बढ़ाती हैं और धुंध-कोहरे के निर्माण को तेज करती हैं।
निर्माण गतिविधियाँ
- शीतकालीन प्रतिबंध हटने के बाद निर्माण और विध्वंस कार्यों से उत्पन्न धूल वायु में फैल जाती है।
मानवीय गतिविधियाँ
- वाहन उत्सर्जन, उद्योग तथा कचरा जलाना लगातार वायु में प्रदूषकों का उत्सर्जन करते रहते हैं।
स्रोत: TH